मानव सभ्यता के विकास में खनिज एवं ऊर्जा संसाधनों की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उद्योग, परिवहन, बिजली उत्पादन, कृषि, संचार तथा दैनिक जीवन की लगभग हर वस्तु किसी न किसी खनिज या ऊर्जा संसाधन पर निर्भर करती है। आधुनिक विकास का आधार खनिज और ऊर्जा दोनों हैं। लेकिन इनका अत्यधिक उपयोग पर्यावरण और भविष्य के संसाधनों के लिए चुनौती बन गया है, इसलिए इनके संरक्षण की आवश्यकता भी बढ़ गई है।
प्राकृतिक रूप से पृथ्वी की सतह या उसके भीतर पाए जाने वाले ऐसे पदार्थ जिनकी निश्चित रासायनिक संरचना तथा भौतिक गुण होते हैं, उन्हें खनिज कहते हैं।
उदाहरण:
लोहा, तांबा, सोना, अभ्रक, बॉक्साइट, चूना पत्थर आदि।
खनिजों का निर्माण लाखों वर्षों में विभिन्न भूवैज्ञानिक प्रक्रियाओं से होता है।
जब मैग्मा ठंडा होकर जमता है तब कई खनिज बनते हैं।
उदाहरण:
लोहा, तांबा, जस्ता।
नदियों और समुद्रों द्वारा जमा पदार्थों से खनिज बनते हैं।
उदाहरण:
कोयला, पेट्रोलियम।
गर्म और शुष्क क्षेत्रों में जल के वाष्पीकरण से खनिज बनते हैं।
उदाहरण:
जिप्सम, नमक।
ऐसे खनिज जिनसे धातु प्राप्त होती है, उन्हें धात्विक खनिज कहते हैं।
इनमें लोहे की मात्रा अधिक होती है।
उदाहरण:
लोहा, मैंगनीज, निकेल, कोबाल्ट।
इनमें लोहे की मात्रा नहीं होती।
उदाहरण:
तांबा, सीसा, जस्ता, सोना, चांदी।
ऐसे खनिज जिनसे धातु प्राप्त नहीं होती, उन्हें अधात्विक खनिज कहते हैं।
उदाहरण:
अभ्रक, चूना पत्थर, जिप्सम, फॉस्फेट।
लोहा आधुनिक उद्योगों की रीढ़ माना जाता है।
मैंगनीज इस्पात उद्योग के लिए महत्वपूर्ण खनिज है।
यह एल्युमिनियम प्राप्त करने का मुख्य स्रोत है।
अभ्रक विद्युत का कुचालक होता है।
कोयला एक प्रमुख ऊर्जा संसाधन है।
पेट्रोलियम को “काला सोना” कहा जाता है।
यह स्वच्छ ऊर्जा स्रोत माना जाता है।
वे संसाधन जिनसे ऊर्जा प्राप्त होती है, ऊर्जा संसाधन कहलाते हैं।
ऐसे ऊर्जा स्रोत जिनका उपयोग लंबे समय से होता आ रहा है।
ऐसे ऊर्जा स्रोत जिनका उपयोग आधुनिक समय में बढ़ा है।
सूर्य से प्राप्त ऊर्जा को सौर ऊर्जा कहते हैं।
हवा की गति से प्राप्त ऊर्जा को पवन ऊर्जा कहते हैं।
बहते जल से प्राप्त ऊर्जा को जल विद्युत कहते हैं।
जैविक पदार्थों से प्राप्त ऊर्जा को बायोमास ऊर्जा कहते हैं।
समुद्री ज्वार-भाटा से प्राप्त ऊर्जा।
पृथ्वी के अंदर की गर्मी से प्राप्त ऊर्जा।
परमाणु विखंडन से प्राप्त ऊर्जा को परमाणु ऊर्जा कहते हैं।
भविष्य के लिए संसाधनों का सुरक्षित एवं संतुलित उपयोग संरक्षण कहलाता है।
पुरानी वस्तुओं को पुनः उपयोग योग्य बनाना।
उदाहरण:
धातु, कागज, प्लास्टिक।
आवश्यकतानुसार संसाधनों का उपयोग करना।
सौर और पवन ऊर्जा का उपयोग बढ़ाना।
वनों की रक्षा और नए पेड़ लगाना।
लोगों को संसाधन संरक्षण के प्रति जागरूक करना।
ऐसा विकास जिसमें वर्तमान आवश्यकताएँ पूरी हों लेकिन भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं से समझौता न हो।
पृथ्वी से खनिज निकालने की प्रक्रिया को खनन कहते हैं।
भूमि की सतह से खनिज निकालना।
भूमि के अंदर सुरंग बनाकर खनिज निकालना।
खनिज एवं ऊर्जा संसाधनों के अत्यधिक उपयोग से पर्यावरण प्रभावित होता है।
कोयला एवं पेट्रोलियम के जलने से धुआँ और गैसें निकलती हैं।
खनन और तेल रिसाव से जल स्रोत दूषित होते हैं।
खनन से भूमि बंजर हो जाती है।
जीवाश्म ईंधन के उपयोग से ग्रीनहाउस गैसें बढ़ती हैं।
कारखानों से निकलने वाली गैसों से अम्लीय वर्षा होती है।
कुछ गैसें ओजोन परत को नुकसान पहुँचाती हैं।
ऊर्जा संसाधनों की कमी की स्थिति को ऊर्जा संकट कहते हैं।
भारत खनिज संसाधनों में समृद्ध देश है, लेकिन बढ़ती जनसंख्या और औद्योगिकीकरण के कारण इन संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है। इसलिए सतत विकास और संरक्षण की नीतियाँ अपनाना आवश्यक है।
खनिज एवं ऊर्जा संसाधन किसी भी देश के विकास की आधारशिला हैं। इनके बिना आधुनिक जीवन की कल्पना संभव नहीं है। लेकिन इनका अंधाधुंध उपयोग पर्यावरण और भविष्य दोनों के लिए खतरा बन सकता है। इसलिए संसाधनों का संतुलित उपयोग, संरक्षण, पुनर्चक्रण तथा नवीकरणीय ऊर्जा का अधिक उपयोग करना अत्यंत आवश्यक है।
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