प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) के दौरान भारत ब्रिटिश साम्राज्य का उपनिवेश था, इसलिए उसे बिना सहमति युद्ध में शामिल कर लिया गया। इस युद्ध ने भारत की आर्थिक, सामाजिक और ग्रामीण व्यवस्था को गहराई से प्रभावित किया।
भारत को ब्रिटिश साम्राज्य की “आपूर्ति व्यवस्था” (supply base) की तरह इस्तेमाल किया गया। भारत से कच्चा माल जैसे कपास, जूट, गेहूं और चाय बड़ी मात्रा में बाहर भेजा गया, जिससे देश में आवश्यक वस्तुओं की कमी होने लगी।
युद्ध के खर्च को पूरा करने के लिए सरकार ने करों में भारी वृद्धि कर दी। भूमि कर और आयकर बढ़ा दिए गए, जिससे किसानों और आम जनता पर आर्थिक बोझ बहुत बढ़ गया।
महंगाई तेजी से बढ़ी क्योंकि वस्तुओं की आपूर्ति कम हो गई और सरकार ने अधिक मुद्रा छापी। इससे रुपये का मूल्य घट गया और जीवन यापन महंगा हो गया।
ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों को कर नकद में देना पड़ता था, इसलिए उन्हें अपनी फसल बेचनी पड़ती थी। खराब फसल या सूखे की स्थिति में किसान कर्ज में डूबने लगे।
युद्ध के दौरान बड़े पैमाने पर सैनिक भर्ती की गई। गाँवों से युवाओं को जबरन सेना में ले जाया गया, जिससे खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई।
1918 की फ्लू महामारी और कई क्षेत्रों में अकाल ने स्थिति को और गंभीर बना दिया। लाखों लोगों की मृत्यु हुई और स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह कमजोर साबित हुई।
महात्मा गांधी 1915 में भारत लौटे और उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन को एक नई दिशा दी। उनका मानना था कि स्वतंत्रता केवल हिंसा से नहीं बल्कि नैतिक शक्ति और जन समर्थन से प्राप्त की जा सकती है।
सत्याग्रह का अर्थ है सत्य पर अडिग रहते हुए अहिंसक तरीके से अन्याय का विरोध करना। यह केवल विरोध का तरीका नहीं बल्कि एक नैतिक जीवन दर्शन भी था।
गांधीजी के अनुसार सत्याग्रह के मुख्य आधार सत्य, अहिंसा, आत्मबल और धैर्य थे। उन्होंने जनता को यह सिखाया कि डर के बिना शांतिपूर्ण तरीके से विरोध किया जा सकता है।
चंपारण सत्याग्रह बिहार में नील की खेती से जुड़े किसानों के शोषण के खिलाफ था। किसानों को “तीन कठिया प्रणाली” के तहत अपनी जमीन पर नील उगाना पड़ता था। गांधीजी ने स्थिति की जांच कर किसानों को राहत दिलाई।
खेड़ा सत्याग्रह गुजरात में हुआ जहाँ सूखा पड़ने के बावजूद किसानों से कर वसूला जा रहा था। गांधीजी के हस्तक्षेप के बाद किसानों को कर में राहत मिली।
अहमदाबाद मिल हड़ताल में मजदूरों की मजदूरी बढ़ाने की मांग थी। गांधीजी ने भूख हड़ताल के माध्यम से मजदूरों का समर्थन किया और अंततः मजदूरी बढ़ाई गई।
रॉलेट एक्ट ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाया गया एक दमनकारी कानून था जिसके तहत बिना मुकदमा चलाए किसी को भी गिरफ्तार किया जा सकता था। इससे नागरिक स्वतंत्रता पूरी तरह प्रभावित हुई और पूरे देश में इसका विरोध हुआ।
अमृतसर में शांतिपूर्ण सभा के दौरान जनरल डायर ने बिना चेतावनी गोली चलवा दी। लोग बाहर नहीं निकल सके और बड़ी संख्या में लोग मारे गए। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया और स्वतंत्रता आंदोलन को तीव्र कर दिया।
प्रथम विश्व युद्ध के बाद तुर्की के खलीफा पद को समाप्त कर दिया गया। भारतीय मुसलमानों ने इसके विरोध में खिलाफत आंदोलन शुरू किया। गांधीजी ने इस आंदोलन का समर्थन किया जिससे हिंदू-मुस्लिम एकता मजबूत हुई।
असहयोग आंदोलन ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक व्यापक जन आंदोलन था। इसमें लोगों ने सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और संस्थानों का बहिष्कार किया। विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार कर खादी को अपनाया गया। यह आंदोलन पूरे देश में फैल गया।
उत्तर प्रदेश में प्रदर्शन के दौरान भीड़ हिंसक हो गई और पुलिस स्टेशन में आग लगा दी गई। गांधीजी ने अहिंसा के सिद्धांत का उल्लंघन होने के कारण आंदोलन वापस ले लिया।
साइमन कमीशन भारत में संवैधानिक सुधारों की जांच के लिए भेजा गया था, लेकिन इसमें कोई भारतीय सदस्य नहीं था। इसी कारण पूरे देश में इसका विरोध हुआ और “साइमन वापस जाओ” के नारे लगे।
सविनय अवज्ञा आंदोलन गांधीजी द्वारा शुरू किया गया एक बड़ा जन आंदोलन था। इसकी शुरुआत दांडी यात्रा से हुई जहाँ गांधीजी ने नमक कानून तोड़ा। यह आंदोलन कर न देने, विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार और जंगल कानूनों के विरोध पर आधारित था।
ब्रिटिश सरकार ने भारत के संविधान पर चर्चा के लिए गोलमेज सम्मेलन आयोजित किए। लेकिन राजनीतिक मतभेदों के कारण कोई स्थायी समाधान नहीं निकल सका। गांधी-इरविन समझौते के बाद कुछ समय के लिए आंदोलन रोक दिया गया।
किसान, मजदूर, आदिवासी, व्यापारी, महिलाएँ और छात्र सभी ने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया। प्रत्येक वर्ग की अलग-अलग समस्याएँ थीं, लेकिन सभी का उद्देश्य ब्रिटिश शासन का विरोध करना था।
डॉ. भीमराव अंबेडकर ने दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। समाज में छुआछूत और भेदभाव को खत्म करने की मांग की गई। पूना पैक्ट के माध्यम से दलितों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिया गया।
भारत माता की छवि, वंदे मातरम्, राष्ट्रीय ध्वज और लोक संस्कृति ने भारतीयों में एकता और राष्ट्रीय भावना को मजबूत किया।
भगत सिंह और HSRA जैसे क्रांतिकारियों ने सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से ब्रिटिश शासन के खिलाफ आवाज उठाई। उनका उद्देश्य पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करना था।
समाचार पत्रों और साहित्य ने लोगों में राष्ट्रीय चेतना जगाई। ब्रिटिश सरकार द्वारा सेंसरशिप लगाए जाने के बावजूद राष्ट्रवादी विचार फैलते रहे।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया और विभिन्न आंदोलनों को संगठित किया।
महिलाओं ने आंदोलनों में सक्रिय भाग लिया, जुलूस निकाले, विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार किया और स्वतंत्रता संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भारत में राष्ट्रवाद एक लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया थी जिसमें सभी वर्गों की भागीदारी शामिल थी। गांधीजी के नेतृत्व में यह आंदोलन एक जन आंदोलन बना और स्वतंत्रता की दिशा में निर्णायक रूप से आगे बढ़ा।
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