जनन एक जैविक प्रक्रिया है जिसके द्वारा जीव अपने जैसे नए जीव उत्पन्न करते हैं। यह जीवन की निरंतरता बनाए रखने के लिए आवश्यक है क्योंकि प्रत्येक जीव का जीवनकाल सीमित होता है।
यदि जनन न हो तो किसी भी प्रजाति का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। जनन के माध्यम से माता-पिता की आनुवंशिक जानकारी DNA के रूप में संतानों में स्थानांतरित होती है।
जनन के दो मुख्य प्रकार होते हैं अलैंगिक जनन और लैंगिक जनन।
हर जीव का जीवनकाल अलग होता है। कुछ जीव बहुत कम समय जीवित रहते हैं जबकि कुछ बहुत लंबे समय तक।
बैक्टीरिया कुछ मिनटों से घंटों तक जीवित रहते हैं। कीट कुछ दिन या महीनों तक जीवित रहते हैं। मानव का जीवनकाल लगभग 60 से 80 वर्ष तक होता है। कुछ वृक्ष जैसे बरगद सैकड़ों वर्ष तक जीवित रह सकते हैं।
जीवनकाल समाप्त होने का अर्थ मृत्यु है इसलिए प्रजाति को बनाए रखने के लिए जनन आवश्यक है।
DNA वह अणु है जिसमें आनुवंशिक जानकारी होती है। जनन से पहले DNA अपनी समान प्रतिकृति बनाता है ताकि नई कोशिकाओं को समान जानकारी मिल सके।
इस प्रक्रिया में DNA की दो strands अलग हो जाती हैं और नए nucleotides जुड़कर दो समान DNA अणु बनाते हैं।
DNA प्रतिकृति का महत्व यह है कि इससे आनुवंशिक गुण आगे जाते हैं और छोटे परिवर्तन विविधता (variation) उत्पन्न करते हैं जो evolution में मदद करते हैं।
कोशिका विभाजन जनन का आधार है।
माइटोसिस में शरीर की वृद्धि और अलैंगिक जनन होता है और इसमें दो समान कोशिकाएँ बनती हैं।
मियोसिस में युग्मक बनते हैं और chromosome संख्या आधी हो जाती है। यह लैंगिक जनन के लिए आवश्यक है।
अलैंगिक जनन वह प्रक्रिया है जिसमें केवल एक जनक होता है और बिना युग्मक निर्माण के नया जीव बनता है।
इसमें संतान बिल्कुल माता-पिता जैसी होती है जिसे clone कहा जाता है।
इसकी विशेषता है कि यह तेज होता है लेकिन इसमें आनुवंशिक विविधता नहीं होती।
इसमें एक कोशिका पहले अपना DNA दोहराती है और फिर दो समान भागों में विभाजित हो जाती है।
अमीबा, पैरामीशियम और बैक्टीरिया में यह प्रक्रिया पाई जाती है।
इसमें एक कोशिका के अंदर कई nucleus बनते हैं और वह कई छोटे-छोटे जीवों में टूट जाती है।
प्लाज्मोडियम जैसे परजीवी में यह प्रक्रिया होती है।
इसमें जीव के शरीर पर एक छोटा उभार बनता है जो बढ़कर नया जीव बन जाता है।
यीस्ट और हाइड्रा में यह देखा जाता है।
इसमें जीव का शरीर टूटकर छोटे भागों में विभाजित हो जाता है और प्रत्येक भाग नया जीव बनाता है।
यह स्पाइरोगायरा जैसे शैवाल में पाया जाता है।
इसमें शरीर का कोई हिस्सा कट जाने पर उससे पूरा नया जीव बन सकता है।
प्लेनेरिया और स्टारफिश में यह क्षमता होती है। इसमें विशेष कोशिकाएँ शरीर का पुनर्निर्माण करती हैं।
इसमें सूक्ष्म बीजाणु बनते हैं जो अनुकूल परिस्थितियों में अंकुरित होकर नया जीव बनाते हैं।
Rhizopus जैसे कवक में यह प्रक्रिया होती है। बीजाणु मोटी दीवार वाले होते हैं जिससे वे कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रहते हैं।
इसमें पौधों के जड़, तना या पत्ती से नया पौधा बनता है।
इसमें बीज की आवश्यकता नहीं होती।
प्राकृतिक विधियों में आलू, शकरकंद और ब्रायोफिलम शामिल हैं।
कृत्रिम विधियों में कटिंग, लेयरिंग, ग्राफ्टिंग और टिशू कल्चर शामिल हैं।
ग्राफ्टिंग में दो पौधों को जोड़कर एक नया पौधा बनाया जाता है जिसमें दोनों के अच्छे गुण आ जाते हैं।
टिशू कल्चर में पौधे की कोशिकाओं को प्रयोगशाला में विकसित करके नए पौधे बनाए जाते हैं।
इसमें दो जनक होते हैं और नर तथा मादा युग्मक मिलकर नया जीव बनाते हैं।
इसमें मियोसिस द्वारा युग्मक बनते हैं और निषेचन के बाद युग्मनज बनता है।
इस प्रक्रिया में आनुवंशिक विविधता उत्पन्न होती है जो evolution के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
फूल पौधे का जनन अंग होता है।
बाह्यदल कली की रक्षा करते हैं। पंखुड़ियाँ परागणकों को आकर्षित करती हैं।
पुंकेसर नर भाग है जिसमें परागकण बनते हैं। अंडप मादा भाग है जिसमें अंडाशय, वर्तिका और वर्तिकाग्र होते हैं।
परागकणों का पुंकेसर से वर्तिकाग्र तक पहुँचना परागण कहलाता है।
स्वपरागण में एक ही पौधे के फूल में परागण होता है जिससे विविधता कम होती है।
परपरागण में अलग-अलग पौधों के बीच परागण होता है जिससे विविधता अधिक होती है।
परागण हवा, पानी, कीट और पक्षियों द्वारा होता है।
इसमें नर और मादा युग्मक मिलकर युग्मनज बनाते हैं।
परागकण से pollen tube बनती है जो अंडाशय तक पहुँचती है और वहाँ निषेचन होता है।
निषेचन के बाद युग्मनज भ्रूण में बदलता है। अंडाशय फल बन जाता है और बीजांड बीज बन जाते हैं।
बीज हवा, पानी, जानवर और विस्फोट द्वारा फैलते हैं।
पुरुष जनन तंत्र में वृषण शुक्राणु बनाते हैं और टेस्टोस्टेरोन हार्मोन उत्पन्न करते हैं। शुक्रवाहिनी शुक्राणु को आगे ले जाती है और प्रोस्टेट ग्रंथि द्रव बनाती है।
महिला जनन तंत्र में अंडाशय अंडाणु बनाते हैं और हार्मोन उत्पन्न करते हैं। अंडवाहिनी में निषेचन होता है और गर्भाशय में भ्रूण का विकास होता है।
यह लगभग 28 दिन का चक्र होता है।
इसमें चार चरण होते हैं। मासिक स्राव में गर्भाशय की परत टूटती है। फॉलिक्युलर चरण में अंडाणु विकसित होता है। ओव्यूलेशन में अंडाणु बाहर निकलता है। ल्यूटियल चरण में गर्भावस्था के लिए शरीर तैयार होता है।
इस प्रक्रिया को FSH, LH, estrogen और progesterone नियंत्रित करते हैं।
निषेचन के बाद युग्मनज बनता है जो भ्रूण में विकसित होता है और बाद में fetus बनता है।
Placenta माँ और बच्चे के बीच ऑक्सीजन, पोषण और अपशिष्ट का आदान-प्रदान करता है।
जनन स्वास्थ्य का अर्थ है प्रजनन तंत्र को स्वस्थ रखना और रोगों से बचाव करना।
गर्भनिरोधक विधियों में कंडोम, कॉपर-टी, हार्मोनल गोलियाँ और सर्जिकल विधियाँ शामिल हैं।
HIV/AIDS जैसे रोग असुरक्षित यौन संबंध और रक्त संपर्क से फैलते हैं और शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर करते हैं।
अलैंगिक जनन तेज होता है लेकिन इसमें विविधता नहीं होती। लैंगिक जनन धीमा होता है लेकिन इसमें आनुवंशिक विविधता उत्पन्न होती है। दोनों ही जीवन की निरंतरता के लिए आवश्यक हैं।
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