पर्यावरण वह प्राकृतिक व्यवस्था है जो पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखती है। इसमें सभी जीवित और निर्जीव घटक शामिल होते हैं।
पर्यावरण के दो मुख्य भाग होते हैं जैविक घटक और अजैविक घटक।
जैविक घटक में सभी जीवित प्राणी आते हैं जैसे पौधे, जानवर और सूक्ष्मजीव।
अजैविक घटक में हवा, पानी, मिट्टी, सूर्य का प्रकाश और तापमान आते हैं।
ये दोनों मिलकर जीवन का संतुलन बनाए रखते हैं।
पारितंत्र वह व्यवस्था है जिसमें जीव और उनका भौतिक वातावरण एक-दूसरे के साथ मिलकर कार्य करते हैं और संतुलन बनाए रखते हैं।
पारितंत्र दो प्रकार के होते हैं प्राकृतिक पारितंत्र जैसे जंगल, तालाब और समुद्र तथा कृत्रिम पारितंत्र जैसे खेत, बगीचा और एक्वेरियम।
जैविक घटक वे सभी जीवित तत्व हैं जो पारितंत्र का हिस्सा होते हैं।
उत्पादक वे जीव होते हैं जो अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। पौधे प्रकाश संश्लेषण द्वारा सूर्य की ऊर्जा का उपयोग करके भोजन बनाते हैं।
उदाहरण हरे पौधे और शैवाल।
ये सभी जीवों के भोजन का आधार होते हैं।
उपभोक्ता वे जीव हैं जो अपना भोजन स्वयं नहीं बना सकते और दूसरों पर निर्भर रहते हैं।
प्राथमिक उपभोक्ता वे होते हैं जो पौधों को खाते हैं जैसे गाय, बकरी और हिरण।
द्वितीयक उपभोक्ता छोटे मांसाहारी होते हैं जैसे मेंढक और छोटी मछली।
तृतीयक उपभोक्ता बड़े शिकारी होते हैं जैसे शेर और बाज।
सर्वाहारी वे होते हैं जो पौधे और जानवर दोनों खाते हैं जैसे मनुष्य।
अपघटक वे सूक्ष्मजीव हैं जो मृत पौधों और जानवरों को तोड़कर सरल पदार्थों में बदल देते हैं।
उदाहरण बैक्टीरिया और फंगस।
ये पोषक तत्वों को वापस मिट्टी में मिलाते हैं और पर्यावरण को साफ रखते हैं।
अजैविक घटक वे निर्जीव कारक हैं जो जीवों को प्रभावित करते हैं।
इनमें सूर्य का प्रकाश, तापमान, जल, वायु, मिट्टी और खनिज शामिल हैं।
खाद्य श्रृंखला वह क्रम है जिसमें ऊर्जा एक जीव से दूसरे जीव में स्थानांतरित होती है।
उदाहरण घास से टिड्डा टिड्डे से मेंढक मेंढक से सांप और सांप से बाज तक।
हर स्तर पर ऊर्जा कम होती जाती है क्योंकि उसका उपयोग जीवन क्रियाओं में हो जाता है।
खाद्य श्रृंखला दो प्रकार की होती है चराई खाद्य श्रृंखला जो पौधों से शुरू होती है और अपघटन खाद्य श्रृंखला जो मृत पदार्थों से शुरू होती है।
जब कई खाद्य श्रृंखलाएँ आपस में जुड़ जाती हैं तो उसे खाद्य जाल कहते हैं।
यह पारितंत्र को अधिक स्थिर बनाता है क्योंकि एक जीव के खत्म होने पर दूसरा भोजन स्रोत उपलब्ध रहता है।
यह विभिन्न पोषण स्तरों पर ऊर्जा, संख्या और जैवभार को दर्शाता है।
ऊर्जा पिरामिड हमेशा सीधा होता है क्योंकि ऊर्जा हर स्तर पर कम होती जाती है।
जैवभार पिरामिड प्रत्येक स्तर पर जीवों के कुल वजन को दर्शाता है।
संख्या पिरामिड प्रत्येक स्तर पर जीवों की संख्या को दर्शाता है।
खाद्य श्रृंखला के प्रत्येक चरण को पोषण स्तर कहते हैं।
पहले स्तर पर उत्पादक होते हैं दूसरे स्तर पर प्राथमिक उपभोक्ता तीसरे स्तर पर द्वितीयक उपभोक्ता और चौथे स्तर पर तृतीयक उपभोक्ता होते हैं।
एक पोषण स्तर से अगले पोषण स्तर में केवल 10 प्रतिशत ऊर्जा ही स्थानांतरित होती है।
बाकी ऊर्जा श्वसन और अन्य क्रियाओं में गर्मी के रूप में नष्ट हो जाती है।
जब हानिकारक रसायन जैसे DDT खाद्य श्रृंखला में ऊपर की ओर बढ़ते जाते हैं और उनकी मात्रा बढ़ती जाती है तो इसे जैव आवर्धन कहते हैं।
सबसे अधिक प्रभाव शीर्ष उपभोक्ता पर पड़ता है।
ओजोन परत पृथ्वी के वायुमंडल में स्थित एक सुरक्षात्मक परत है जो सूर्य की हानिकारक UV किरणों से बचाती है।
ओजोन का निर्माण ऑक्सीजन से होता है O2 टूटकर O बनता है और फिर O3 बनता है।
CFC गैसें ओजोन परत को नष्ट करती हैं।
UV किरणों से त्वचा कैंसर आंखों की समस्या और पौधों को नुकसान होता है।
कचरे का सही तरीके से संग्रह निपटान और पुनर्चक्रण करना अपशिष्ट प्रबंधन कहलाता है।
जैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट वे होते हैं जो प्राकृतिक रूप से सड़ जाते हैं जैसे भोजन और पत्ते।
अजैव निम्नीकरणीय अपशिष्ट वे होते हैं जो नहीं सड़ते जैसे प्लास्टिक और कांच।
अपशिष्ट प्रबंधन के तरीके हैं कम उपयोग करना पुनः उपयोग करना पुनर्चक्रण करना खाद बनाना और कचरे को अलग अलग करना।
सूर्य सभी पारितंत्रों का मुख्य ऊर्जा स्रोत है।
सभी जीव एक दूसरे पर निर्भर रहते हैं।
खाद्य जाल पारितंत्र को स्थिर बनाता है।
अपघटक पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण करते हैं।
प्लास्टिक और प्रदूषण पर्यावरण के लिए गंभीर समस्या हैं।
मानव गतिविधियाँ प्राकृतिक संतुलन को प्रभावित करती हैं।
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