कोई भी परमाणु प्रकृति में न्यूनतम ऊर्जा (Minimum Energy) तथा अधिकतम स्थिरता (Maximum Stability) प्राप्त करना चाहता है। निष्क्रिय गैसों (Noble Gases) की बाहरी कक्षा पूर्ण होती है, इसलिए वे अत्यधिक स्थिर होती हैं। अन्य तत्व भी इसी प्रकार की स्थिरता प्राप्त करने के लिए इलेक्ट्रॉन त्यागते, ग्रहण करते या साझा करते हैं। इसी कारण रासायनिक बंधों का निर्माण होता है।
सबसे स्थिर इलेक्ट्रॉनिक विन्यास को Noble Gas Configuration कहते हैं। जैसे Ne (2,8) तथा Ar (2,8,8)। जब कोई परमाणु ऐसा विन्यास प्राप्त कर लेता है तो उसकी स्थिरता बढ़ जाती है।
कुछ तत्व 8 इलेक्ट्रॉन नहीं बल्कि 2 इलेक्ट्रॉन प्राप्त करके स्थिर हो जाते हैं। हाइड्रोजन और हीलियम इसके प्रमुख उदाहरण हैं। इसे Duplet Rule कहा जाता है।
परमाणु के सबसे बाहरी कोश में उपस्थित इलेक्ट्रॉन, जो बंध निर्माण में भाग लेते हैं, संयोजक इलेक्ट्रॉन कहलाते हैं। किसी तत्व के रासायनिक गुण मुख्यतः इन्हीं इलेक्ट्रॉनों पर निर्भर करते हैं।
किसी परमाणु की बंध बनाने की क्षमता को संयोजकता कहते हैं। उदाहरण के लिए हाइड्रोजन की संयोजकता 1, ऑक्सीजन की 2, नाइट्रोजन की 3 तथा कार्बन की 4 होती है।
कोसेल के अनुसार धातुएँ इलेक्ट्रॉन त्यागती हैं और अधातुएँ इलेक्ट्रॉन ग्रहण करती हैं, जिससे आयनिक बंध बनता है। लुईस के अनुसार परमाणु इलेक्ट्रॉनों का साझाकरण करते हैं, जिससे सहसंयोजक बंध बनता है। यही आधुनिक रासायनिक बंधन सिद्धांत का आधार है।
किसी तत्व के संयोजक इलेक्ट्रॉनों को बिंदुओं के रूप में दर्शाने की विधि Lewis Symbol कहलाती है। यह बंध निर्माण को समझने का सरल तरीका है।
परमाणु अपनी बाहरी कक्षा में 8 इलेक्ट्रॉन प्राप्त करके निष्क्रिय गैस जैसी स्थिरता प्राप्त करना चाहते हैं। यही Octet Rule कहलाता है। NaCl, CH₄, NH₃ और H₂O इसके उदाहरण हैं।
कुछ अणुओं में केंद्रीय परमाणु के पास 8 से कम इलेक्ट्रॉन होते हैं, जैसे BF₃ तथा BeCl₂। इन्हें अपूर्ण अष्टक (Incomplete Octet) कहते हैं।
कुछ अणुओं में 8 से अधिक इलेक्ट्रॉन होते हैं, जैसे PCl₅, SF₆ तथा IF₇। इन्हें विस्तारित अष्टक (Expanded Octet) कहते हैं।
कुछ अणुओं में इलेक्ट्रॉनों की संख्या विषम होती है, जैसे NO तथा NO₂। इन्हें विषम इलेक्ट्रॉन अणु (Odd Electron Molecules) कहते हैं।
नाभिक द्वारा बाहरी इलेक्ट्रॉनों पर लगाए गए वास्तविक आकर्षण बल को Effective Nuclear Charge कहते हैं। इसके बढ़ने पर परमाणु त्रिज्या घटती है तथा विद्युतऋणात्मकता और आयनीकरण ऊर्जा बढ़ती है।
गैसीय अवस्था में किसी परमाणु से एक इलेक्ट्रॉन निकालने के लिए आवश्यक ऊर्जा को आयनीकरण एन्थैल्पी कहते हैं। यह किसी परमाणु की इलेक्ट्रॉन खोने की प्रवृत्ति को दर्शाती है।
जब कोई गैसीय परमाणु इलेक्ट्रॉन ग्रहण करता है और ऊर्जा मुक्त होती है, तो उसे इलेक्ट्रॉन बंधुता कहते हैं। इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की प्रवृत्ति जितनी अधिक होगी, इलेक्ट्रॉन बंधुता उतनी अधिक होगी।
किसी बंध में साझा इलेक्ट्रॉनों को अपनी ओर आकर्षित करने की परमाणु की क्षमता को विद्युतऋणात्मकता कहते हैं। फ्लोरीन सबसे अधिक विद्युतऋणात्मक तत्व है।
इलेक्ट्रॉन के पूर्ण स्थानांतरण से आयनिक बंध बनता है।
इलेक्ट्रॉनों के साझाकरण से सहसंयोजक बंध बनता है।
बंध निर्माण के लिए आवश्यक दोनों इलेक्ट्रॉन एक ही परमाणु द्वारा दिए जाएँ तो समन्वय बंध बनता है।
जब एक परमाणु पूर्ण रूप से इलेक्ट्रॉन त्याग देता है और दूसरा उसे ग्रहण कर लेता है, तब आयनिक बंध बनता है। उदाहरण के लिए NaCl, MgO तथा CaCl₂।
आयनिक यौगिक सामान्यतः कठोर, भंगुर, उच्च गलनांक तथा उच्च क्वथनांक वाले होते हैं। ये पिघली अवस्था में विद्युत के सुचालक होते हैं।
गैसीय आयनों से एक मोल आयनिक ठोस बनने पर जो ऊर्जा मुक्त होती है, उसे लैटिस ऊर्जा कहते हैं। यह आयनिक यौगिक की स्थिरता का माप है।
आयनिक यौगिकों की निर्माण एन्थैल्पी ज्ञात करने की ऊष्मागतिकीय विधि को Born-Haber Cycle कहते हैं। इसमें आयनीकरण ऊर्जा, इलेक्ट्रॉन बंधुता, बंध विच्छेदन ऊर्जा तथा लैटिस ऊर्जा का उपयोग किया जाता है।
यह नियम बताता है कि किसी आयनिक यौगिक में सहसंयोजक गुण कितना होगा। छोटा और अधिक आवेश वाला धनायन तथा बड़ा ऋणायन सहसंयोजक गुण को बढ़ाते हैं।
धनायन द्वारा ऋणायन के इलेक्ट्रॉन बादल को विकृत करने की प्रक्रिया को ध्रुवण कहते हैं।
धनायन की विकृति उत्पन्न करने की क्षमता को Polarizing Power कहते हैं।
ऋणायन की विकृत होने की क्षमता को Polarizability कहते हैं।
जब दो परमाणु इलेक्ट्रॉनों को साझा करते हैं तब सहसंयोजक बंध बनता है। उदाहरण के रूप में H₂, O₂, N₂ तथा CH₄ को लिया जा सकता है।
एक इलेक्ट्रॉन युग्म साझा होने पर एकल बंध बनता है।
दो इलेक्ट्रॉन युग्म साझा होने पर द्विबंध बनता है।
तीन इलेक्ट्रॉन युग्म साझा होने पर त्रिबंध बनता है।
जब बंध निर्माण में भाग लेने वाले दोनों इलेक्ट्रॉन एक ही परमाणु द्वारा प्रदान किए जाते हैं, तब Coordinate Bond बनता है। NH₄⁺, H₃O⁺ तथा CO इसके उदाहरण हैं।
अणुओं में इलेक्ट्रॉनों तथा बंधों को प्रदर्शित करने की विधि Lewis Structure कहलाती है। इससे अणु की संरचना तथा स्थिरता का अध्ययन किया जाता है।
संयोजक इलेक्ट्रॉनों को बिंदुओं के रूप में प्रदर्शित करने की विधि Electron Dot Structure कहलाती है।
बंधों को रेखाओं के माध्यम से दर्शाने वाली संरचना Lewis Formula कहलाती है।
Localized Bond में इलेक्ट्रॉन केवल दो परमाणुओं के बीच सीमित रहते हैं।
Delocalized Bond में इलेक्ट्रॉन पूरे अणु में फैले रहते हैं, जैसे Benzene तथा Carbonate Ion।
जब किसी अणु को एक से अधिक Lewis Structures द्वारा दर्शाया जा सकता है तो उस घटना को Resonance कहते हैं। NO₃⁻, CO₃²⁻, O₃ तथा Benzene इसके उदाहरण हैं।
वास्तविक संरचना जो सभी अनुनादी संरचनाओं का मिश्रण होती है, Resonance Hybrid कहलाती है।
अनुनाद संकर की अतिरिक्त स्थिरता को Resonance Energy कहते हैं।
Lewis Structure में किसी परमाणु पर उपस्थित काल्पनिक आवेश को Formal Charge कहते हैं। न्यूनतम Formal Charge वाली संरचना अधिक स्थिर होती है।
बंध लंबाई, बंध कोण, बंध ऊर्जा तथा बंध क्रम को सामूहिक रूप से Bond Parameters कहा जाता है।
दो नाभिकों के बीच की औसत दूरी को Bond Length कहते हैं।
बंध लंबाई का आधा भाग Covalent Radius कहलाता है।
दो असंबद्ध परमाणुओं के बीच न्यूनतम दूरी का आधा भाग Van der Waals Radius कहलाता है।
दो बंधों के बीच बने कोण को Bond Angle कहते हैं।
बंध को तोड़ने के लिए आवश्यक ऊर्जा को Bond Energy कहते हैं।
विशिष्ट बंध को पूर्ण रूप से तोड़ने के लिए आवश्यक ऊर्जा को Bond Dissociation Energy कहते हैं।
दो परमाणुओं के बीच बंधों की संख्या को Bond Order कहते हैं। Bond Order बढ़ने पर बंध अधिक मजबूत और स्थिर हो जाता है।
यदि इलेक्ट्रॉनों का वितरण असमान हो तो Polar Bond बनता है।
यदि वितरण समान हो तो Non-Polar Bond बनता है।
H₂O, NH₃ तथा HCl ध्रुवीय अणु हैं।
N₂, O₂ तथा CO₂ अध्रुवीय अणु हैं।
अणु की ध्रुवीयता का माप Dipole Moment कहलाता है। इसका उपयोग अणु का आकार और ध्रुवीयता ज्ञात करने में किया जाता है।
संयोजक कोश के इलेक्ट्रॉन युग्म एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं और अधिकतम दूरी पर व्यवस्थित होते हैं। यही अणु की ज्यामिति निर्धारित करता है।
बंधन में भाग लेने वाले इलेक्ट्रॉन Bond Pair कहलाते हैं।
बंधन में भाग न लेने वाले इलेक्ट्रॉन Lone Pair कहलाते हैं।
Lone Pair की उपस्थिति Bond Angle को कम कर देती है।
Linear, Trigonal Planar, Bent, Trigonal Pyramidal, Tetrahedral, Trigonal Bipyramidal, See-Saw, T-Shaped, Octahedral, Square Pyramidal तथा Square Planar सभी महत्वपूर्ण आणविक आकार हैं।
Atomic Orbitals के मिश्रण से समान ऊर्जा वाले नए Hybrid Orbitals का निर्माण Hybridization कहलाता है।
sp संकरण में Linear Geometry प्राप्त होती है।
sp² संकरण में Trigonal Planar Geometry प्राप्त होती है।
sp³ संकरण में Tetrahedral Geometry प्राप्त होती है।
sp³d संकरण में Trigonal Bipyramidal Geometry प्राप्त होती है।
sp³d² संकरण में Octahedral Geometry प्राप्त होती है।
sp³d³ संकरण में Pentagonal Bipyramidal Geometry प्राप्त होती है।
बंध निर्माण के लिए परमाण्विक कक्षक आपस में Overlap करते हैं। Overlap जितना अधिक होगा, बंध उतना ही मजबूत होगा।
s-s Overlap
s-p Overlap
p-p Overlap
Head-on Overlap से बनने वाला मजबूत बंध Sigma Bond कहलाता है। यह स्वतंत्र घूर्णन की अनुमति देता है।
Sidewise Overlap से बनने वाला बंध Pi Bond कहलाता है। यह Sigma Bond से कमजोर होता है तथा घूर्णन की अनुमति नहीं देता।
यह आधुनिक सिद्धांत बताता है कि इलेक्ट्रॉन पूरे अणु में फैले हुए Molecular Orbitals में उपस्थित रहते हैं। यह सिद्धांत Valence Bond Theory की कई कमियों को दूर करता है।
इनकी ऊर्जा कम होती है तथा ये अणु की स्थिरता बढ़ाते हैं।
इनकी ऊर्जा अधिक होती है तथा ये अणु की स्थिरता कम करते हैं।
ये बंध निर्माण में भाग नहीं लेते तथा इनकी ऊर्जा लगभग अपरिवर्तित रहती है।
जिन अणुओं में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं वे Paramagnetic कहलाते हैं।
जिन अणुओं में सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित होते हैं वे Diamagnetic कहलाते हैं।
O₂ Paramagnetic अणु का प्रसिद्ध उदाहरण है।
जब हाइड्रोजन सीधे F, O या N से जुड़ा हो और किसी अन्य विद्युतऋणात्मक परमाणु के Lone Pair से आकर्षित हो, तब Hydrogen Bond बनता है।
दो अलग-अलग अणुओं के बीच बनने वाला Hydrogen Bond Intermolecular Hydrogen Bonding कहलाता है। H₂O तथा HF इसके उदाहरण हैं।
एक ही अणु के भीतर बनने वाला Hydrogen Bond Intramolecular Hydrogen Bonding कहलाता है। o-Nitrophenol तथा Salicylic Acid इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
Hydrogen Bonding के कारण पदार्थों का गलनांक, क्वथनांक, श्यानता तथा पृष्ठ तनाव बढ़ जाता है। यह जल की असामान्य विशेषताओं का भी मुख्य कारण है।
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| Patna University BA BSc BCom Syllabus | Syllabus |
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