खाद्य सुरक्षा का अर्थ केवल भोजन उपलब्ध होना नहीं है, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को हर समय पर्याप्त, सुरक्षित, पौष्टिक और सस्ता भोजन प्राप्त होना भी है। यदि किसी देश में भोजन उपलब्ध है, लेकिन लोग उसे खरीद नहीं सकते या उन तक भोजन पहुँच नहीं पाता, तो उसे खाद्य सुरक्षा नहीं कहा जा सकता।
भारत एक कृषि प्रधान देश है, फिर भी यहाँ गरीबी, कुपोषण, बेरोजगारी, प्राकृतिक आपदाएँ तथा वितरण संबंधी समस्याओं के कारण खाद्य सुरक्षा एक महत्वपूर्ण मुद्दा बनी हुई है। इसी कारण सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS), बफर स्टॉक, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) जैसी अनेक योजनाएँ लागू की हैं।
जब सभी लोगों को हर समय पर्याप्त मात्रा में भोजन उपलब्ध हो, भोजन खरीदने की क्षमता हो तथा भोजन पौष्टिक और सुरक्षित हो, तब उसे खाद्य सुरक्षा कहते हैं।
देश में पर्याप्त मात्रा में खाद्यान्न और अन्य खाद्य पदार्थों का होना उपलब्धता कहलाता है।
यदि देश में पर्याप्त खाद्यान्न उत्पादन नहीं होगा तो खाद्य सुरक्षा संभव नहीं होगी।
भोजन उपलब्ध होने के बाद भी यदि लोग उसे प्राप्त नहीं कर सकते तो खाद्य सुरक्षा अधूरी रह जाती है।
वहनीयता का अर्थ है कि लोगों की आय इतनी हो कि वे अपनी आवश्यकता के अनुसार भोजन खरीद सकें।
यदि बाजार में भोजन उपलब्ध है लेकिन उसकी कीमत बहुत अधिक है, तो गरीब लोग उसे खरीद नहीं पाएँगे।
भोजन की उपलब्धता, पहुँच और वहनीयता पूरे वर्ष बनी रहनी चाहिए।
खाद्य सुरक्षा लोगों को भूख और भुखमरी से बचाती है।
पर्याप्त एवं पौष्टिक भोजन स्वस्थ जीवन के लिए आवश्यक है।
स्वस्थ नागरिक अधिक उत्पादक होते हैं, जिससे देश का विकास होता है।
खाद्य संकट से सामाजिक अशांति और अपराध बढ़ सकते हैं।
जब किसी व्यक्ति को पर्याप्त, सुरक्षित और पौष्टिक भोजन नहीं मिलता, तो इसे खाद्य असुरक्षा कहते हैं।
यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है।
यह वर्ष के कुछ विशेष महीनों में उत्पन्न होती है।
यह अचानक उत्पन्न होती है।
भारत में खाद्य असुरक्षा का सबसे बड़ा कारण गरीबी है।
गरीब परिवार पर्याप्त भोजन खरीदने में सक्षम नहीं होते।
रोजगार न होने पर आय नहीं होती, जिससे भोजन खरीदना कठिन हो जाता है।
जनसंख्या बढ़ने से खाद्यान्न की मांग बढ़ जाती है।
फसलें नष्ट हो जाती हैं।
कृषि भूमि और भंडारित अनाज नष्ट हो जाते हैं।
फसल उत्पादन प्रभावित होता है।
खाद्य वितरण प्रणाली बाधित हो जाती है।
कीमत बढ़ने पर गरीब लोग पर्याप्त भोजन नहीं खरीद पाते।
उचित गोदामों की कमी के कारण बड़ी मात्रा में अनाज खराब हो जाता है।
भूख खाद्य असुरक्षा का सबसे बड़ा परिणाम है।
लंबे समय तक भोजन की कमी।
कुछ विशेष समय में भोजन की कमी।
जब शरीर को आवश्यक पोषक तत्व नहीं मिलते, तो कुपोषण होता है।
केवल पेट भरना पर्याप्त नहीं है। भोजन में आवश्यक पोषक तत्व भी होने चाहिए।
यह भारत के इतिहास की सबसे भीषण खाद्य त्रासदियों में से एक था।
युद्ध के कारण खाद्यान्न आपूर्ति प्रभावित हुई।
व्यापारियों ने अनाज छिपाकर रखा।
खाद्यान्न अत्यधिक महँगा हो गया।
सरकार समय पर सहायता नहीं पहुँचा सकी।
1960 के दशक में भारत में खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने के लिए हरित क्रांति शुरू की गई।
सरकार किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अनाज खरीदती है। इसे सरकारी खरीद कहा जाता है।
सरकार द्वारा निर्धारित वह न्यूनतम मूल्य जिस पर किसानों की फसल खरीदी जाती है।
1965
सरकार द्वारा भविष्य की आवश्यकता के लिए सुरक्षित रखा गया अतिरिक्त खाद्यान्न भंडार।
सरकार द्वारा गरीब लोगों को कम कीमत पर खाद्यान्न उपलब्ध कराने की व्यवस्था।
इन दुकानों के माध्यम से राशन वितरित किया जाता है।
1997 में शुरू की गई।
इसका उद्देश्य गरीब परिवारों की पहचान कर उन्हें अधिक लाभ पहुँचाना था।
2000 में शुरू की गई।
सबसे गरीब परिवार
अत्यंत कम कीमत पर खाद्यान्न उपलब्ध कराना।
गरीब एवं निराश्रित वृद्ध लोगों को निःशुल्क खाद्यान्न उपलब्ध कराने के लिए शुरू की गई।
विद्यालयों में बच्चों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने की योजना।
यह अधिनियम खाद्य सुरक्षा को कानूनी अधिकार प्रदान करता है।
भारत में खाद्य सुरक्षा का उद्देश्य प्रत्येक नागरिक को पर्याप्त, पौष्टिक और सस्ता भोजन उपलब्ध कराना है। खाद्य सुरक्षा के मुख्य आधार उपलब्धता, पहुँच, वहनीयता और स्थिरता हैं। सरकार FCI, MSP, बफर स्टॉक, PDS, TPDS, AAY तथा NFSA जैसी योजनाओं के माध्यम से खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रयास करती है। फिर भी गरीबी, कुपोषण, प्राकृतिक आपदाएँ और वितरण संबंधी समस्याएँ आज भी बड़ी चुनौतियाँ हैं। इसलिए खाद्य सुरक्षा के साथ-साथ पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करना भी अत्यंत आवश्यक है।
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