यह अध्याय बताता है कि पशुपालक समुदाय कौन होते हैं, उनका जीवन कैसे चलता है, वे अपने पशुओं के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान पर क्यों जाते हैं, औपनिवेशिक शासन ने उनके जीवन को कैसे प्रभावित किया और आधुनिक समय में उनके जीवन में क्या परिवर्तन आए हैं। पशुपालक समुदाय सदियों से मानव सभ्यता का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। वे केवल पशु नहीं पालते, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था, व्यापार और संस्कृति के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
पशुपालक (Pastoralists) वे लोग होते हैं जिनकी आजीविका मुख्य रूप से पशुओं पर निर्भर होती है। ये लोग भेड़, बकरी, गाय, भैंस, ऊँट, याक, घोड़े और रेनडियर जैसे पशुओं का पालन करते हैं। पशुपालकों के लिए पशु केवल आय का साधन नहीं होते बल्कि उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा, संस्कृति और जीवनशैली का आधार भी होते हैं।
पशुपालन का अर्थ है पशुओं का पालन-पोषण करके उनसे प्राप्त होने वाले उत्पादों जैसे दूध, घी, मक्खन, ऊन, मांस और चमड़े से जीवनयापन करना।
• पशुधन पर निर्भर अर्थव्यवस्था।
• प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग।
• मौसम के अनुसार जीवनशैली में परिवर्तन।
• सामुदायिक जीवन और पारंपरिक ज्ञान।
• चरागाहों पर निर्भरता।
• भोजन उपलब्ध कराता है।
• रोजगार प्रदान करता है।
• ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाता है।
• वस्त्र उद्योग के लिए ऊन उपलब्ध कराता है।
• परिवहन और कृषि कार्यों में सहायता करता है।
घुमंतू समुदाय स्थायी रूप से एक स्थान पर नहीं रहते। वे अपने पशुओं के साथ पानी और चारे की तलाश में लगातार स्थान बदलते रहते हैं।
ये समुदाय वर्ष के कुछ समय एक स्थान पर रहते हैं और कुछ समय पशुओं के साथ प्रवास करते हैं।
• तंबुओं या अस्थायी घरों में रहना।
• पशुओं के साथ यात्रा करना।
• चरागाहों की खोज करना।
• प्राकृतिक परिस्थितियों के अनुसार जीवन जीना।
• पशुओं को पर्याप्त चारा मिलता है।
• प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग होता है।
• सूखे और अकाल से बचाव होता है।
• शिक्षा की कमी।
• स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी।
• मौसम की मार।
• सरकारी प्रतिबंध।
मौसमी प्रवास पशुपालकों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है। मौसम बदलने पर पशुपालक अपने पशुओं के साथ नए चरागाहों की ओर चले जाते हैं।
• चारे की उपलब्धता।
• पानी की उपलब्धता।
• अत्यधिक गर्मी या सर्दी से बचाव।
• पशुओं के स्वास्थ्य की रक्षा।
पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले पशुपालक गर्मियों में ऊँचे पहाड़ों पर और सर्दियों में निचले क्षेत्रों में चले जाते हैं।
मैदानी और रेगिस्तानी क्षेत्रों में पशुपालक लंबी दूरी तय करते हुए नए चरागाहों तक पहुँचते हैं।
मौसम के अनुसार नियमित रूप से एक निश्चित मार्ग पर होने वाले प्रवास को ट्रांसह्यूमेंस कहा जाता है।
पालतू पशुओं की कुल संख्या और संपत्ति को पशुधन कहा जाता है।
• आय का प्रमुख स्रोत।
• व्यापार का आधार।
• ग्रामीण उद्योगों का विकास।
• सम्मान और प्रतिष्ठा का प्रतीक।
• विवाह और सामाजिक समारोहों में उपयोग।
• पारंपरिक संस्कृति का हिस्सा।
• दूध
• दही
• घी
• मक्खन
• पनीर
• ऊन
• चमड़ा
• मांस
वह भूमि जहाँ पशु घास और अन्य वनस्पतियाँ खाते हैं, चरागाह कहलाती है।
पशुओं को खुले क्षेत्रों में चरने दिया जाता है।
निश्चित क्षेत्र और समय के अनुसार चराई कराई जाती है।
पूरे समुदाय द्वारा साझा चरागाहों का उपयोग किया जाता है।
• कृषि भूमि का विस्तार।
• जंगलों का आरक्षण।
• औद्योगिकीकरण।
• शहरीकरण।
• जलवायु परिवर्तन।
• हिमालयी क्षेत्रों में निवास।
• मुख्य रूप से भैंस पालन।
• दूध उत्पादन के लिए प्रसिद्ध।
• जम्मू-कश्मीर के प्रमुख घुमंतू समुदाय।
• भेड़ और बकरी पालन।
• लंबी दूरी का मौसमी प्रवास।
• हिमाचल प्रदेश में निवास।
• भेड़ और बकरी पालन।
• ऊँचे और निचले क्षेत्रों के बीच प्रवास।
• गुजरात और राजस्थान के प्रसिद्ध पशुपालक।
• ऊँट और भेड़ पालन।
• महाराष्ट्र के पशुपालक समुदाय।
• ऊन उत्पादन के लिए प्रसिद्ध।
• नीलगिरि पहाड़ियों में निवास।
• भैंस पालन प्रमुख व्यवसाय।
• दक्षिण भारत के महत्वपूर्ण पशुपालक समुदाय।
• केन्या और तंजानिया में रहते हैं।
• गाय पालन प्रमुख व्यवसाय।
• पशुओं को धन और प्रतिष्ठा का प्रतीक मानते हैं।
• अरब मरुस्थलों के घुमंतू समुदाय।
• ऊँट पालन प्रमुख कार्य।
• उत्तरी यूरोप में निवास।
• रेनडियर पालन करते हैं।
• याक, घोड़े और भेड़ पालन।
• विशाल घास के मैदानों में जीवन।
ब्रिटिश शासन और अन्य यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियों ने पशुपालकों के जीवन में बड़े बदलाव किए।
सरकार ने जंगलों को अपने नियंत्रण में लेना शुरू किया।
• चराई पर प्रतिबंध।
• लकड़ी काटने पर रोक।
• पशुपालकों की आवाजाही सीमित।
• सीमित गतिविधियों की अनुमति।
यह अधिनियम पशुपालकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे उनके पारंपरिक अधिकार सीमित हो गए।
• पशु चराने के लिए कर देना पड़ता था।
• पशुपालकों की आय कम हुई।
• कई लोगों को पशुओं की संख्या घटानी पड़ी।
• यात्रा के लिए सरकारी अनुमति आवश्यक।
• स्वतंत्र आवागमन समाप्त।
कुछ घुमंतू समुदायों को “अपराधी” घोषित कर दिया गया।
इसके परिणाम:
• नियमित निगरानी।
• स्वतंत्रता में कमी।
• सामाजिक भेदभाव।
सरकार चराई कर और अन्य करों से आय प्राप्त करना चाहती थी।
ब्रिटिश सरकार अधिक कृषि भूमि विकसित करना चाहती थी।
रेलवे के लिए लकड़ी और भूमि की आवश्यकता थी।
जंगलों को आर्थिक संसाधन के रूप में देखा गया।
• चरागाह भूमि का नुकसान।
• राष्ट्रीय उद्यानों की स्थापना।
• आवाजाही पर प्रतिबंध।
यूरोपीय बसने वालों को उपजाऊ भूमि दे दी गई।
• पशुओं की संख्या पर नियंत्रण।
• सरकारी नियम और कर।
• कानूनों का विरोध।
• पारंपरिक अधिकारों की मांग।
• करों के खिलाफ आंदोलन।
• नए व्यापार अपनाना।
• कृषि शुरू करना।
• स्थायी बस्तियों में बसना।
• बच्चों की शिक्षा बढ़ी।
• नए रोजगार अवसर मिले।
• बाजारों तक पहुँच आसान हुई।
• व्यापार बढ़ा।
• दुग्ध सहकारी समितियाँ।
• श्वेत क्रांति का प्रभाव।
• दूध उत्पादन में वृद्धि।
• टीकाकरण।
• आधुनिक उपचार।
• नस्ल सुधार कार्यक्रम।
• सूखा बढ़ रहा है।
• चरागाह कम हो रहे हैं।
• चरागाह भूमि पर शहर बस रहे हैं।
• भूमि का औद्योगिक उपयोग बढ़ रहा है।
• कई क्षेत्रों में चराई प्रतिबंधित।
• देशों की सीमाओं के कारण पारंपरिक प्रवास मार्ग बाधित हुए।
भारत विश्व के सबसे बड़े दुग्ध उत्पादक देशों में से एक है और इसमें पशुपालकों का महत्वपूर्ण योगदान है।
वस्त्र उद्योग के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराते हैं।
चमड़ा उद्योग को आधार प्रदान करते हैं।
ग्रामीण रोजगार और व्यापार को बढ़ावा देते हैं।
• पशुपालक (Pastoralist)
• चरागाह (Pasture)
• पशुधन (Livestock)
• मौसमी प्रवास (Seasonal Migration)
• ट्रांसह्यूमेंस (Transhumance)
• घुमंतू समुदाय (Nomadic Community)
• चराई कर (Grazing Tax)
• आरक्षित वन (Reserved Forest)
• संरक्षित वन (Protected Forest)
• औपनिवेशिक शासन (Colonial Rule)
• अपराधी जनजाति अधिनियम (Criminal Tribes Act)
• डेयरी उद्योग (Dairy Industry)
• ट्रांसह्यूमेंस क्या है और क्यों किया जाता है?
• गुज्जर, बकरवाल, गद्दी और राबारी समुदायों की विशेषताएँ।
• वन अधिनियम 1878 का प्रभाव।
• चराई कर का महत्व।
• अपराधी जनजाति अधिनियम 1871।
• मासाई समुदाय की समस्याएँ।
• औपनिवेशिक शासन का पशुपालकों पर प्रभाव।
• आधुनिक समय में पशुपालकों के सामने चुनौतियाँ।
• पशुपालकों का आर्थिक और सामाजिक योगदान।
यह विस्तृत सामग्री अध्याय के लगभग सभी NCERT बिंदुओं, उप-विषयों, केस स्टडी, औपनिवेशिक नीतियों, भारतीय एवं वैश्विक पशुपालक समुदायों, प्रवास प्रणाली, चरागाह प्रबंधन, चुनौतियों और परीक्षा-उपयोगी तथ्यों को कवर करती है।
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