निर्माण (Construction) ज्यामिति का वह भाग है जिसमें केवल स्केल (Ruler) और परकार (Compass) की सहायता से बिना किसी अनुमान के सटीक ज्यामितीय आकृतियाँ बनाई जाती हैं। इसका उद्देश्य केवल चित्र बनाना नहीं बल्कि गणितीय नियमों के आधार पर शुद्ध संरचना तैयार करना होता है।
निर्माण का अर्थ है किसी ज्यामितीय आकृति को दिए गए मापों और शर्तों के अनुसार केवल ज्यामितीय उपकरणों की सहायता से बनाना।
उदाहरण के रूप में निश्चित लंबाई का रेखाखंड बनाना, कोण का समद्विभाजन करना, त्रिभुज बनाना, लंब या समानांतर रेखा बनाना आदि शामिल हैं।
सटीकता (Accuracy) निर्माण का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है क्योंकि छोटी सी गलती पूरा परिणाम बदल सकती है। हर माप बिल्कुल सही होना चाहिए और किसी भी प्रकार का अनुमान नहीं लगाया जाता। निर्माण हमेशा चरणबद्ध प्रक्रिया में किया जाता है जिसमें हर कदम का एक निश्चित क्रम होता है।
बिंदु वह होता है जिसका केवल स्थान होता है और कोई आकार नहीं होता। रेखा दोनों दिशाओं में अनंत तक जाती है। रेखाखंड सीमित लंबाई वाली रेखा होती है जबकि किरण एक बिंदु से शुरू होकर एक दिशा में अनंत तक जाती है।
स्केल का उपयोग रेखाएँ खींचने और दूरी मापने के लिए किया जाता है। परकार का उपयोग चाप और वृत्त बनाने तथा समान दूरी निर्धारित करने के लिए किया जाता है। पेंसिल पतली और स्पष्ट रेखाएँ बनाने के लिए उपयोग की जाती है। सेट स्क्वायर का उपयोग 30°, 45° और 90° कोण बनाने में किया जाता है।
यदि AB = 6 cm बनाना हो तो पहले एक बिंदु A बनाया जाता है, फिर स्केल से 6 cm मापकर B बिंदु बनाया जाता है और दोनों को जोड़ दिया जाता है।
रेखाखंड का मध्य बिंदु वह होता है जो उसे दो बराबर भागों में बाँटता है। निर्माण में A और B से समान त्रिज्या लेकर ऊपर और नीचे चाप बनाए जाते हैं। उनके प्रतिच्छेद को जोड़ने पर जो रेखा बनती है वह AB को जिस बिंदु पर काटती है वही मध्य बिंदु होता है।
यह ऐसी रेखा होती है जो किसी रेखाखंड को 90° पर काटती है और उसे दो बराबर भागों में विभाजित करती है। इसका उपयोग मध्य बिंदु ज्ञात करने और सममिति समझने में किया जाता है।
किसी रेखाखंड को बराबर भागों में बाँटना विभाजन कहलाता है। इसके लिए ज्यामितीय विधियों जैसे perpendicular bisector या समान भागों की construction विधि का उपयोग किया जाता है।
कोण दो किरणों के बीच झुकाव होता है। निर्माण में पहले एक किरण बनाई जाती है और फिर परकार की सहायता से आवश्यक कोण निर्धारित किया जाता है।
यह कोण को दो बराबर भागों में बाँटता है। निर्माण में शीर्ष से चाप बनाकर दोनों भुजाओं को काटा जाता है और फिर उन बिंदुओं से चाप बनाकर प्रतिच्छेद को जोड़ दिया जाता है।
60° कोण समबाहु त्रिभुज विधि से बनाया जाता है। 90° कोण लंब निर्माण से बनता है। 45° कोण 90° का समद्विभाजन होता है। 30° कोण 60° का समद्विभाजन होता है। 120° कोण 60° को बढ़ाकर बनाया जाता है।
किसी बिंदु से रेखा पर लंब खींचने के लिए चाप की सहायता से दो बिंदु बनाए जाते हैं और फिर उनके मध्य से रेखा खींचकर 90° बनाया जाता है।
दी गई रेखा पर कोण बनाकर उसी कोण को दूसरी जगह कॉपी किया जाता है जिससे दोनों रेखाएँ समानांतर बन जाती हैं और कभी नहीं मिलतीं।
त्रिभुज निर्माण में तीन मापों के आधार पर आकृति बनाई जाती है। SSS विधि में तीनों भुजाएँ दी होती हैं। SAS विधि में दो भुजाएँ और बीच का कोण दिया होता है। ASA विधि में दो कोण और बीच की भुजा दी होती है। AAS विधि में दो कोण और एक भुजा दी होती है। RHS विधि समकोण त्रिभुज के लिए होती है जिसमें कर्ण और एक भुजा दी होती है।
किसी भी त्रिभुज में किसी भी दो भुजाओं का योग तीसरी भुजा से बड़ा होना चाहिए, अन्यथा त्रिभुज नहीं बन सकता।
लॉस उन सभी बिंदुओं का समूह होता है जो किसी निश्चित शर्त को पूरा करते हैं जैसे समान दूरी या मध्य बिंदु की शर्त।
परकार का फिसलना, गलत माप, मोटी पेंसिल का उपयोग और असटीक चाप निर्माण सामान्य त्रुटियाँ हैं जो पूरे निर्माण को गलत कर सकती हैं।
निर्माण में सटीकता अत्यंत आवश्यक है क्योंकि यह गणितीय शुद्धता सुनिश्चित करती है और इसका उपयोग इंजीनियरिंग, वास्तुकला और परीक्षाओं में भी होता है।
निर्माण ज्यामिति का वह महत्वपूर्ण भाग है जिसमें स्केल और परकार की सहायता से नियमों के आधार पर सटीक आकृतियाँ बनाई जाती हैं और यह पूरी तरह से तार्किक और चरणबद्ध प्रक्रिया पर आधारित होता है।
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