संस्कृत व्याकरण में लकार अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। किसी भी भाषा में क्रिया (Verb) यह बताती है कि कार्य कब हुआ, हो रहा है या होगा, तथा वह कार्य आज्ञा, इच्छा, संभावना, आशीर्वाद या आदेश के रूप में कहा जा रहा है। संस्कृत में इन सभी भावों और कालों को व्यक्त करने के लिए लकारों का प्रयोग किया जाता है।
यदि धातु संस्कृत व्याकरण का हृदय है, तो लकार धातु की शक्ति हैं। बिना लकार के क्रिया का सही अर्थ समझना संभव नहीं होता।
जिस प्रत्यय या रूप के द्वारा क्रिया के काल (Tense) अथवा भाव (Mood) का ज्ञान हो, उसे लकार कहते हैं।
उदाहरण
यहाँ “पठति”, “अपठत्” और “पठिष्यति” तीनों क्रिया रूप अलग-अलग लकारों में हैं।
लकारों के माध्यम से हम जान सकते हैं—
पाणिनीय व्याकरण में मुख्यतः 10 लकार माने जाते हैं।
जो समय (काल) का बोध कराते हैं।
जो मनोभाव व्यक्त करते हैं।
जब क्रिया वर्तमान समय में हो रही हो, तब लट् लकार का प्रयोग किया जाता है।
कभी-कभी भूतकाल की घटनाएँ भी वर्तमान रूप में बताई जाती हैं।
जिस कार्य का होना भूतकाल में हो चुका हो और वह आज न हुआ हो, वहाँ लङ् लकार का प्रयोग होता है।
अधिकांश रूपों के आरम्भ में “अ” आता है।
ऐसी घटना जो भूतकाल में हुई हो लेकिन वक्ता ने उसे स्वयं न देखा हो।
इसमें धातु का अभ्यास होता है।
सामान्य रूप से बीते हुए कार्य को बताने के लिए।
| लङ् | लुङ् |
|---|---|
| अनद्यतन भूतकाल | सामान्य भूतकाल |
| विस्तृत भूत घटना | साधारण भूत घटना |
भविष्य में होने वाले कार्य का बोध।
दूर भविष्य या निश्चित भविष्य की घटना के लिए।
आज्ञा, आदेश, निवेदन, अनुरोध, प्रेरणा आदि के लिए।
इच्छा, संभावना, कर्तव्य, सलाह तथा उपदेश का बोध।
आशीर्वाद, मंगलकामना और शुभेच्छा व्यक्त करने के लिए।
यह वैदिक संस्कृत का लकार है।
जिसके बारे में कहा जाए।
जिससे कहा जाए।
जो स्वयं बोले।
एक व्यक्ति
दो व्यक्ति
दो से अधिक व्यक्ति
लकारों के रूप बनाते समय पद का बहुत महत्व होता है।
क्रिया का फल दूसरे को प्राप्त हो।
उदाहरण
परस्मैपद प्रत्यय
क्रिया का फल स्वयं को प्राप्त हो।
उदाहरण
आत्मनेपद प्रत्यय
जो दोनों पदों में प्रयुक्त हो।
उदाहरण
लकारों का निर्माण धातुओं से होता है।
प्रमुख धातुएँ
उदाहरण
धातु = पठ्
लकार = लट्
पुरुष = प्रथम
वचन = एकवचन
रूप = पठति
| लकार | काल/भाव | सामान्य पहचान |
|---|---|---|
| लट् | वर्तमान | ति |
| लङ् | भूत | अ + धातु |
| लिट् | परोक्ष भूत | अभ्यास |
| लुङ् | सामान्य भूत | अ |
| लृट् | भविष्य | ष्य |
| लुट् | दूर भविष्य | ता |
| लोट् | आज्ञा | तु |
| विधिलिङ् | चाहिए/संभावना | एत् |
| आशीर्लिङ् | आशीर्वाद | यात् |
| लेट् | वैदिक प्रयोग | विशेष रूप |
इस प्रकार लकार अध्याय को पूरी तरह समझने के लिए केवल लट्, लङ् और लृट् लकार ही नहीं, बल्कि धातु, पद, पुरुष, वचन, तिङ् प्रत्यय, गण, विकरण, वाच्य तथा सभी 10 लकारों के प्रयोग और रूप निर्माण का अध्ययन भी आवश्यक है।
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