वन समाज और उपनिवेशवाद कक्षा 9 इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। इसमें बताया गया है कि ब्रिटिश शासन से पहले वन और वनवासी समाज का जीवन कैसा था, ब्रिटिश सरकार ने वनों पर नियंत्रण क्यों स्थापित किया, वन कानूनों ने लोगों के जीवन को कैसे प्रभावित किया तथा वनवासियों ने अपने अधिकारों के लिए किस प्रकार संघर्ष किया। यह अध्याय केवल भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के अन्य देशों के वन समाजों की स्थिति को भी समझाता है।
ब्रिटिश शासन से पहले भारत के विशाल वन क्षेत्र लाखों लोगों की आजीविका का आधार थे। उस समय वन केवल पेड़ों का समूह नहीं थे, बल्कि लोगों के जीवन, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और धार्मिक आस्था का केंद्र थे।
वन मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करते थे। भोजन, ईंधन, औषधि, पशुओं का चारा और घर बनाने की सामग्री वनों से प्राप्त होती थी। आदिवासी समुदायों का पूरा जीवन वनों पर आधारित था।
आदिवासी भारत के सबसे पुराने निवासियों में से माने जाते हैं। वे जंगलों में रहते थे और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग आवश्यकता के अनुसार करते थे। उनका जीवन प्रकृति के साथ संतुलन पर आधारित था।
आदिवासी समुदाय जंगली पशुओं का शिकार करते थे तथा जंगलों से फल, फूल, कंद-मूल, शहद, लाख और गोंद इकट्ठा करते थे। यही उनकी आय और भोजन का मुख्य स्रोत था।
झूम खेती को स्थानांतरित खेती कहा जाता है। इसमें जंगल के एक भाग को साफ करके कुछ वर्षों तक खेती की जाती थी। भूमि की उर्वरता कम होने पर किसान दूसरी जगह जाकर खेती करने लगते थे।
| क्षेत्र | नाम |
|---|---|
| असम | झूम |
| मध्य प्रदेश | बेवर |
| आंध्र प्रदेश | पोडू |
| ओडिशा | डोंगर चास |
| पश्चिमी घाट | कुमारी |
कुछ समुदाय पशुपालन करते थे और मौसम के अनुसार स्थान बदलते थे। वे जंगलों और घास के मैदानों पर निर्भर रहते थे।
वनों से प्राप्त बांस, लाख, गोंद, शहद और जड़ी-बूटियों का उपयोग छोटे उद्योगों में किया जाता था। इससे ग्रामीण और आदिवासी लोगों की आय होती थी।
ब्रिटिश शासन के दौरान औद्योगिक क्रांति के कारण लकड़ी की मांग तेजी से बढ़ गई। इसलिए सरकार ने वनों पर अपना नियंत्रण स्थापित करना शुरू किया।
ब्रिटेन की नौसेना को मजबूत जहाजों की आवश्यकता थी। जहाजों के निर्माण में बड़ी मात्रा में लकड़ी का उपयोग किया जाता था।
1853 में भारत में पहली रेल चली। रेलवे के विस्तार के साथ लाखों रेलवे स्लीपरों की आवश्यकता हुई। इसके लिए बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई की गई।
कोयला खदानों में सुरंगों को सहारा देने के लिए लकड़ी की आवश्यकता होती थी। इसलिए खनन उद्योग भी वनों पर निर्भर था।
असम और दक्षिण भारत में चाय तथा कॉफी के बागानों के लिए विशाल वन क्षेत्रों को साफ किया गया।
ब्रिटिश सरकार अधिक भूमि कर प्राप्त करना चाहती थी। इसलिए जंगलों को काटकर खेती योग्य भूमि में बदला गया।
जब जंगल तेजी से कटने लगे तो ब्रिटिश सरकार ने वैज्ञानिक वानिकी की शुरुआत की। इसका उद्देश्य लकड़ी का नियमित उत्पादन बनाए रखना था।
वनों का ऐसा प्रबंधन जिसमें योजनाबद्ध तरीके से पेड़ लगाए और काटे जाएँ ताकि लकड़ी की आपूर्ति लगातार बनी रहे।
डाइट्रिच ब्रैंडिस ने भारत में वैज्ञानिक वानिकी की नींव रखी। उन्होंने वन सर्वेक्षण कराया और वन प्रबंधन की नई तकनीकों को लागू किया।
इस प्रणाली में केवल एक प्रकार के पेड़ लगाए जाते थे।
1864 में ब्रिटिश सरकार ने वन विभाग की स्थापना की।
वनों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने कई कानून बनाए।
इस कानून द्वारा सरकार को वनों पर अधिकार प्राप्त हुआ और लोगों के अधिकार सीमित होने लगे।
यह ब्रिटिश काल का सबसे कठोर वन कानून था।
इन वनों में जनता के अधिकार लगभग समाप्त कर दिए गए थे।
इन वनों में कुछ सीमित अधिकार दिए गए थे।
इनका उपयोग ग्रामीण समुदायों के लिए निर्धारित किया गया था।
इस कानून ने वन विभाग की शक्तियों को और अधिक मजबूत बनाया।
वन कानूनों का सबसे अधिक प्रभाव आदिवासियों, किसानों और पशुपालकों पर पड़ा।
लोगों के पुराने अधिकार समाप्त कर दिए गए। वे स्वतंत्र रूप से लकड़ी, फल, शहद और अन्य वन उत्पाद नहीं ले सकते थे।
झूम खेती को नुकसानदायक बताकर उस पर रोक लगा दी गई। इससे आदिवासी समुदायों की आजीविका प्रभावित हुई।
पशुपालकों को अपने पशुओं को जंगलों में चराने से रोका गया।
वन्य जीवों के संरक्षण के नाम पर शिकार पर रोक लगा दी गई।
बांस, शहद, गोंद और अन्य वन उत्पादों पर सरकार का नियंत्रण स्थापित हो गया।
स्थानीय लोगों से बिना मजदूरी दिए सरकारी कार्य करवाए जाते थे। इसे बेगार प्रथा कहा जाता था।
ब्रिटिश अधिकारियों के लिए शिकार मनोरंजन का साधन था।
बाघ, शेर, तेंदुआ और हाथी जैसे जानवरों का बड़े पैमाने पर शिकार किया जाता था।
खतरनाक समझे जाने वाले जानवरों को मारने पर पुरस्कार दिए जाते थे।
वन्य जीवों की संख्या में भारी कमी आई।
वन क्षेत्रों में लकड़ी काटने और ढुलाई का कार्य ठेकेदारों को दिया जाता था।
बस्तर वर्तमान छत्तीसगढ़ का वन क्षेत्र है जहाँ अनेक आदिवासी समुदाय रहते थे।
वन उनके भोजन, खेती, पशुपालन और धार्मिक जीवन का आधार थे।
जब सरकार ने वनों को आरक्षित घोषित किया तो लोगों के अधिकार सीमित हो गए और विरोध शुरू हुआ।
बस्तर विद्रोह वन कानूनों के विरोध में किया गया एक महत्वपूर्ण आंदोलन था।
सरकार को कुछ नियमों में बदलाव करना पड़ा।
संथालों ने ब्रिटिश शासन, जमींदारों और महाजनों के शोषण के विरुद्ध विद्रोह किया।
बिरसा मुंडा ने आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष किया।
महान हलचल या महान विद्रोह।
जावा में डच सरकार ने वनों पर नियंत्रण स्थापित किया।
स्थानीय किसानों ने वन कानूनों के खिलाफ आंदोलन किया।
प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान लकड़ी की मांग बहुत बढ़ गई।
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